महामारी से लड़ाई को हमारे वैज्ञानिकों ने और भी मजबूत कर दिया है। महज 30 दिन में ही इन्होंने दर्जनभर से ज्यादा जांच किट तैयार कर दी हैं, जो विदेशों की तुलना में न सिर्फ सस्ती हैं, बल्कि आधे से भी कम समय में संक्रमण का पता लगा सकती हैं।
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सीमित संसाधनों के बावजूद महामारी से लड़ाई को हमारे वैज्ञानिकों ने और भी मजबूत कर दिया है। महज 30 दिन के भीतर ही इन्होंने दर्जनभर से ज्यादा जांच किट तैयार कर दी हैं, जो विदेशों की तुलना में न सिर्फ सस्ती हैं, बल्कि आधे से भी कम समय में संक्रमण का पता लगा सकती हैं।
दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में इन स्वदेशी किट्स के जरिए मरीजों की पहचान और सर्विलांस दोनों ही काम शुरू हो चुके हैं। इतना ही नहीं 20 से ज्यादा स्वदेशी किट्स को मान्यता देने के लिए पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वॉयरोलॉजी (एनआईवी) में लगातार ट्रायल जारी है।
भारत में मार्च के पहले सप्ताह में वायरस संक्रमितों की संख्या बढ़ने पर वैज्ञानिकों की एक उच्चस्तरीय कमेटी गठित हुई। उन्होंने महज दो दिन में ही कोरोना को लेकर हर संभव शोध के लिए सभी विकल्प आसान बना दिए। फिर चाहे वह संसाधन से जुड़ा हो या फिर आर्थिक सहायता हो। इसी का नतीजा रहा कि महीनेभर में ही वैज्ञानिक जांच किट्स और पीपीई किट्स बनाने में जुट गए। अन्य वैज्ञानिकों ने वायरस की पहचान और इलाज का जिम्मा संभाला।
आरटी-पीसीआर जांच के लिए नई मशीन
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव डॉ. आशुतोष शर्मा ने बताया कि तिरुवनंतपुरम स्थित श्रीचित्रा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड टैक्नोलॉजी में चार वर्ष पहले एक प्रयोगशाला स्थापित की गई थी। जहां वैज्ञानिक और इंजीनियर दोनों मिलकर काम करते हैं।
वायरस की पुष्टि के लिए एक आरटी पीसीआर जांच होती है लेकिन देश में पीसीआर मशीन ने बहुत ज्यादा नहीं है। एक मशीन करीब 15 लाख रुपये की आती है। इसकी जांच में करीब 2 घंटे का वक्त भी लगता है। एक सैंपल की जांच में करीब 2 से ढाई हजार रुपये लगते हैं लेकिन अब तिरुवनंतपुरम लैब ने एक दूसरी तरह की मशीन विकसित की है।
इसकी कीमत दो से ढाई लाख रुपये के आसपास होगी। इसकी जांच की कीमत एक हजार रुपये के आसपास पड़ेगी। महज 10 मिनट में ही यह वायरस का पता लगा लेगी। अभी एनआईवी की टीम इसकी गुणवत्ता पर काम कर रही है।
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सीमित संसाधनों के बावजूद महामारी से लड़ाई को हमारे वैज्ञानिकों ने और भी मजबूत कर दिया है। महज 30 दिन के भीतर ही इन्होंने दर्जनभर से ज्यादा जांच किट तैयार कर दी हैं, जो विदेशों की तुलना में न सिर्फ सस्ती हैं, बल्कि आधे से भी कम समय में संक्रमण का पता लगा सकती हैं।
दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में इन स्वदेशी किट्स के जरिए मरीजों की पहचान और सर्विलांस दोनों ही काम शुरू हो चुके हैं। इतना ही नहीं 20 से ज्यादा स्वदेशी किट्स को मान्यता देने के लिए पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वॉयरोलॉजी (एनआईवी) में लगातार ट्रायल जारी है।
भारत में मार्च के पहले सप्ताह में वायरस संक्रमितों की संख्या बढ़ने पर वैज्ञानिकों की एक उच्चस्तरीय कमेटी गठित हुई। उन्होंने महज दो दिन में ही कोरोना को लेकर हर संभव शोध के लिए सभी विकल्प आसान बना दिए। फिर चाहे वह संसाधन से जुड़ा हो या फिर आर्थिक सहायता हो। इसी का नतीजा रहा कि महीनेभर में ही वैज्ञानिक जांच किट्स और पीपीई किट्स बनाने में जुट गए। अन्य वैज्ञानिकों ने वायरस की पहचान और इलाज का जिम्मा संभाला।
आरटी-पीसीआर जांच के लिए नई मशीन
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव डॉ. आशुतोष शर्मा ने बताया कि तिरुवनंतपुरम स्थित श्रीचित्रा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड टैक्नोलॉजी में चार वर्ष पहले एक प्रयोगशाला स्थापित की गई थी। जहां वैज्ञानिक और इंजीनियर दोनों मिलकर काम करते हैं।
वायरस की पुष्टि के लिए एक आरटी पीसीआर जांच होती है लेकिन देश में पीसीआर मशीन ने बहुत ज्यादा नहीं है। एक मशीन करीब 15 लाख रुपये की आती है। इसकी जांच में करीब 2 घंटे का वक्त भी लगता है। एक सैंपल की जांच में करीब 2 से ढाई हजार रुपये लगते हैं लेकिन अब तिरुवनंतपुरम लैब ने एक दूसरी तरह की मशीन विकसित की है।
इसकी कीमत दो से ढाई लाख रुपये के आसपास होगी। इसकी जांच की कीमत एक हजार रुपये के आसपास पड़ेगी। महज 10 मिनट में ही यह वायरस का पता लगा लेगी। अभी एनआईवी की टीम इसकी गुणवत्ता पर काम कर रही है।
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